आज टैक्सीकॉप्टर बंद रहेंगे
अरविन्द दुबे
तेईसवीं शताब्दी के आते-आते बढ़ते कल-कारखानों ने, गरमाती धरती ने, तरह-तरह के पर्यावरण प्रदूषण ने, पृथ्वी के वायुमंडल का सत्यानाश कर दिया है। इक्कीसवीं-बाईसवीं शताब्दी तक जो व्यक्ति जितना संपन्न होता था वह उतने ही अधिक उपकरणों का प्रयोग करता था जिससे उसकी ऊर्जा खपत उतनी ही बढ़ जाती थी। अतिरिक्त ऊर्जा पैदा करने में पर्यावरण प्रदूषण और बढ़ जाता है। पर तब उन्हें इसकी परवाह नहीं थी। जो लोग सुख सुविधाएं खरीद सकते थे, भोग सकते थे उन्होने बिना यह सोचे, अपने पैसों के बल पर इनका दुरुपयोग किया, कि इसका खामियाजा उनकी आगे आने वाली पीढ़ी को उठाना पड़ेगा। उनकी पर्यावरण से तब की गई छेड-छाड़ के कारण आज तेईसवीं शताब्दी में क्षमताविहीन लोग परशानियां भुगत रहे हैं। पेड़ कटने से जंगल करीब-करीब समाप्त हो गए हैं। उनकी जगह कंक्रीट के जंगल खड़े हो गए हैं। इससे वातावरण में ऑक्सीजन का स्तर निरंतर गिरता जा रहा है। अत्यधिक प्रदूषण की स्थिति में वायु में ऑक्सीजन स्तर घटकर करीब बीस या कभी-कभी 19.5 प्रतिशत रह जाने की घटनाएं होने लगी हैं। तब कोई श्रम का कार्य करना तो दूर सामान्य कार्य करना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में अगर कहीं आप भीड़ में या सड़क किसी जाम में फंस जाएं तो मुसीबत आनी एकदम तय है क्योंकि ऐसे समय एक जगह बहुत सारे लोगों के एकत्रित होने से वहां के वातावरण में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है और वहां खड़े लोगों को सांस लेने में मुश्किल होने लगती है।
लोगों के लिए अब ऐसी परिस्थितियाँ रोज की घटनाएं हो गईं हैं। इसलिए हर व्यक्ति बाहर निकलते समय अपने साथ ऑक्सीजन का एक माइक्रो सिलेंडर अवश्य लेकर निकलता है, भले ही वह पैदल ही क्यों न जा रहा हो। गाड़ियों में तो आजकल कई माइक्रो सिलेंडर लगे होते हैं जिससे कि अगर कभी ऐसी स्थिति आ जाए तो तुरंत ही वह व्यक्ति ऑक्सीजन लेकर अपने आप को सामान्य कर सके। इसके अतिरिक्त ऑक्सीजन लेने के लिए जगह-जगह ऑक्सीजन पार्लर खुल गए हैं जहां जाकर कोई व्यक्ति आवश्यकता पड़ने पर ऑक्सीजन ले सकता है। फलस्वरूप ऐसे व्यक्तियों की संख्या भी बढ़ने लगी है जिन्हें हमेशा लगता है कि उनमें ऑक्सीजन की कमी हो रही लगी है और वे अनायास ही ऑक्सीजन पार्लर चले जाते हैं। उन्हें धीरे-धीरे ऑक्सीजन की लत लगती जा रही है। हालांकि विशेषज्ञ ऑक्सीजन की लत से आम जन को हमेशा आगाह करते रहते हैं पर बहुत सारे लोग हैं जिन्हें प्रदूषण बढ़ने के कारण धीरे-धीरे ऑक्सीजन लेने की लत लग रही है।
रमन भी बहुत बार ऐसे ही ऑक्सीजन ले लेता है। हालांकि वह पढ़ा लिखा है और वह जानता है कि बार-बार ऑक्सीजन लेने से उसके फेफड़ों में नुकसान पहुंच सकता है लेकिन जरा सा भीड़ में फंसने पर उसे लगने लगता है कि उसकी सांस लेने में तकलीफ होने लगी है और उसके कदम ऑक्सीजन पार्लर की तरफ मुड़ जाते हैं।
आज टैक्सी कॉप्टर की हड़ताल थी, इसलिए रमन सवेरे अपनी स्वचालित इलेक्ट्रिक कार के द्वारा ऑफिस आया था। आमतौर पर लोग अपने ऑफिस, अपने कार्य स्थल या कुछ किलोमीटर जाने के लिए भी अपना व्यक्तिगत वाहन प्रयोग नहीं करते हैं। लोगों में अब प्रचुरता से उपलब्ध टैक्सीकॉप्टर सेवा को प्रयोग करने का चलन तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि टैक्सीकॉप्टर के प्रयोग से एक तो समय बचता है, यह सस्ता पड़ता है और इससे रास्ते में जाम का सामना भी नहीं करना पड़ता है। रास्ते में भीड़ होने से कभी-कभी जो ऑक्सीजन की कमी और घुटन होने लगती है उसका सामना भी टैक्सीकॉप्टर के प्रयोग से नहीं करना पड़ता है। चालक रहित, हलके दो से चार सीटों वाले टैक्सीकॉप्टर बुलाए जाने पर किराए की कार की तरह ही घर की छत पर आकर खड़े हो जाते हैं। जाने वाला इनके कंप्यूटर में अपना गंतव्य फीड करता है। तुरंत स्क्रीन पर ही किराए की राशि चमकने लगती है जिसे ऑनलाइन भुगतान कर ओ.के. बटन दबाते ही टैक्सीकॉप्टर अपनी सवारी को लेकर उड़ जाता है।
सवेरे जब रमन आया था तो भीड़ में फंसकर उसको ऑक्सीजन की कमी का सामना करना पड़ा था और ऑफिस जाने पर उसे सबसे पहले ऑक्सीजन पार्लर में जाकर ऑक्सीजन लेनी पड़ी थी। वह समय तो जैसे-तैसे बीत गया। अब वह ऑफिस से इलेक्ट्रिक कार से ही वापस लौट रहा है। ऑफिस से लौटने का अनुभव कुछ कम कष्टदायक न था। उसकी इलेक्ट्रिक कार इस बार भी कारों के समुद्र के बीच में है। कार में जब घुटन बढ़ने लगी तो रमन को फिर ऑक्सीजन लेने की उत्कट इच्छा (क्रेविंग) होने लगी। हालांकि रमन की कार में अभी भी ऑक्सीजन का छोटा सिलेंडर उपलब्ध है पर कार का इंजन चलते समय ऑक्सीजन का उपयोग खतरनाक हो सकता है। इंजन से निकली एक चिंगारी कार में विस्फोट कर सकती है। कार में ऑक्सीजन की उपलब्धता आपात स्थितियों के लिए ही होती है। हालांकि ऐसी परिस्थितियों में ऑक्सीजन मुंह पर ठीक तरह फिट हो जाने वाले (टाइट फिटिंग) मास्क के जरिए ही ली जाती है पर ऐसा करने के लिए सड़क के किनारे ट्रैफिक से दूर जाकर कार के इंजन को बंद करने के बाद ही ऑक्सीजन लेने का निर्देश है। रमन काफी समय से अपने पर काबू किए हुए है। ट्रैफिक इंच-इंच करके धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है। अंततः रमन के सब्र का बांध टूट गया। उसे लगने लगा कि यदि उसने अभी अतिरिक्त ऑक्सीजन न ली तो उसे कुछ हो जाएगा। भयभीत होकर उसने अपनी गाड़ी में लगा इमरजेंसी हूटर दबाया।
हूटर की आवाज सुनते ही चार कृत्रिम बुद्धि युक्त ट्रैफिक रोबोट रास्ता बनाते हुए उसकी गाड़ी की तरफ लपके। गाड़ियों से खचाखच भरी सड़क पर रास्ता बनाते हुए वे रमन की गाड़ी तक पहुंच गए। रमन अपनी गाड़ी के अंदर बहुत बेचैन था।
“नीड सम हेल्प।” एक रोबोट की यांत्रिक आवाज गूंजी।
“यस, आई नीड ऑक्सीजन, इट'स ए मेडिकल इमरजेंसी।” रमन ने निर्देशित किया।
रोबोट के सीने पर लगी स्क्रीन पर कुछ अंक चमके। वह पुलिस के इमरजेंसी स्क्वाड से संपर्क कर रहा था। थोड़ी ही देर में पुलिस का रेस्क्यू हेलिकॉप्टर उस स्थान पर मंडराने लगा।
“गिव स्पेस, मेडिकल इमरजेंसी, गिव स्पेस, मेडिकल इमरजेंसी” की आवाज हैलीकॉप्टर में लगे स्पीकर से आ रही थी साथ में हैलीकॉप्टर की लाल नियॉन लाइट बराबर जल-बुझ रही थी। नीचे खड़े रोबोट ने बाहर से रमन की कार का ट्रांसमिशन सिस्टम ऊपर उड़ रहे हैलीकॉप्टर से कनेक्ट कर दिया। रमन को ऊपर उड़ रहे हैलीकॉप्टर के रोबोट से संदेश मिलने शुरू हो गए।
“किल द इंजन। किल द इंजन।” ऊपर उड़ रहे हैलीकॉप्टर के रोबोट ने निर्देश दिया।
रमन ने मुंह से ही निर्देश देकर कार का इंजन बंद कर दिया। ऊपर उड़ रहे हैलीकॉप्टर से चार बृहदाकार हुक जैसी संरचनाएं स्टील के तारों के सहारे नीचे आने लगी।
“गिव स्पेस, मेडिकल इमरजेंसी, गिव स्पेस, मेडिकल इमरजेंसी।” नीचे खड़े चारों रोबोट आसपास की कारों में बैठे लोगों को निर्देश दे रहे थे।
रमन की कार के पास खड़े चारों रोबोट्स ने हैलीकॉप्टर से लटकते हुए हुक थाम लिए और उन्हें बड़ी सफाई से रमन की कार में फंसा दिया। क्षण भर में रमन की कार को चार हुक में फँसाकर रेस्क्यू हेलिकॉप्टर सड़क से दूर जा रहा था।
हैलीकॉप्टर से रमन को निर्देश मिला, “यू कैन ओपन योर ऑक्सीजन सिलेंडर नाउ।”
रमन ने ऑक्सीजन सिलेंडर की नोब दवाई और मास्क अपने मुंह पर लगा लिया। शनै-शनै उसकी बेचैनी कम होने लगी।
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हेलिकॉप्टर रमन की कार के साथ पास के मेडिकल पॉइंट की ओर उड़ा जा रहा है। हैलीकॉप्टर के ऑटोमेटिक सिस्टम ने मेडिकल पॉइंट को अपने आगमन की सूचना दे दी थी जिससे वे रोगी को रिसीव करने के लिए तैयार रहें। मेडिकल पॉइंट तक पहुंचते-पहुंचते रमन की स्थिति सामान्य होने लगी थी। रेस्क्यू हेलिकॉप्टर ने बहुत सफाई से रमन की कार को मेडिकल पॉइंट के ‘लैंडिंग एरिया’ में उतार दिया। रेस्क्यू हैलीकॉप्टर के ऑटोमेटिक सिस्टम ने मेडिकल पॉइंट के प्रशासन को अपने आगमन की सूचना दे दी थी इसलिए वहां चार मेडिकल हेल्प रोबोट, एक रेस्क्यू वैन, जिसमें श्वास व ह्रदय की आपात स्थितियों से निपटने के लिए सारे उपकरण यथा वेंटीलेटर, ऑक्सीजन यूनिट, टेंपरेरी एक्सटर्नल पेसमेकर, डिफिब्रलेटर, मल्टीपैरा मॉनीटर, इन्फ्यूजन पंप आदि लगे थे और जरूरी औषधियां भी उपलब्ध थीं। रमन की कार पृथ्वी को छूते ही बिजली की तेजी से हेल्पर रोबोट्स ने रमन की कार का दरवाजा खोला। इस यूनिट का इंचार्ज एक युवा चिकित्सक रेस्क्यू वैन से निकलकर तेजी से रमन की कार की ओर बढ़ा। उसने रमन की ओर देखा जो ऑक्सीजन मास्क लगाए फेफड़ों में ऑक्सीजन खींच रहा था।
“आर यू ओ.के.?” उस युवा चिकित्सक ने अपना सिर कार के दरवाजे में घुसाते हुए कहा।
रमन ने स्वीकृति में सिर हिलाया, पर ऑक्सीजन मास्क अपने मुंह पर लगा रखा था।
युवा चिकित्सक ने एक बैंड रमन की कलाई पर पहना दिया। उसे पहनते ही उसके ऊपर लगी एक छोटी सी स्क्रीन पर रमन के स्वास्थ्य पैरामीटर चमकने लगे।
“आप व्हीलचेयर से जाना पसंद करेंगे?” उसने पूछा।
रमन से स्वीकृति मिलते ही हेल्पर रोबोट ने रमन को उसकी कार में से निकाल कर वहां खड़ी एक स्वचालित व्हीलचेयर पर बिठा दिया। उसने उसकी व्हीलचेयर की आर्म रेस्ट में लगी स्क्रीन पर कुछ फीड किया और व्हीलचेयर में लगा ऑक्सीजन मास्क रमन के मुंह पर लगा दिया। व्हीलचेयर स्वतः ही गंतव्यस्थान की ओर चलने लगा। युवा चिकित्सक ने अपना अंगूठा उठाकर रमन को विदा किया। सारे हेल्पर रोबोट अपने-अपने स्थान पर वापस लौट आए। युवा चिकित्सक रेस्क्यू वैन में जाकर बैठ गया। रमन की व्हीलचेयर मेडिकल पॉइंट के रिसेप्शन काउंटर पर जाकर रुकी। रिसेप्शन काउंटर पर बैठे एंड्राइड ने मशीनी आवाज में रमन का स्वागत किया, “वेलकम सर ,कैसा महसूस कर रहे हैं आप?”
रमन ने मुट्ठी बांधकर अपने बाएं हाथ का अंगूठा सीधा किया, जिसका मतलब था, “अब सब ठीक है।”
पर सामने तो एंड्रॉयड था। उत्तर न पाकर उसने अपना प्रश्न दोहराया।
इस बार रमन ने अपना ऑक्सीजन मास्क मुंह से हटाकर कहा, “फाइन।”
एंड्राइड ने इसके बाद रमन का मेडिकल इंश्योरेंस नंबर मांगा। उस नंबर को एक मशीन में फीड करते ही रमन के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी हो गई और व्हीलचेयर अपने आप चल पड़ी। अब उसे सीधा ट्रीटमेंट रूम में जाना था जहां उसकी उपयुक्त चिकित्सा होगी। रमन के मेडिकल इंश्योरेंस नंबर के लिंक पर अस्पताल ने रमन का ऑनलाइन उपलब्ध मेडिकल रिकॉर्ड और आपातकाल में संपर्क किए जाने वाले व्यक्ति का फोन नंबर ज्ञात कर लिया। स्वचालित सॉफ्टवेयर के जरिए रमन की इंश्योरेंस कंपनी और उसकी पत्नी माधुरी दोनों को तुरंत सूचना पहुंचा दी गई।
रमन को ऑक्सीजन की कमी से होने वाली यह घबराहट पहली बार नहीं हुई है। पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है। हर बार यही प्रक्रिया दोहराई जाती है। पहली बार तो रमन की पत्नी माधुरी बहुत परेशान हुई थी। वह बदहवास सी भागी-भागी अस्पताल पहुंच गई थी। पर बार-बार ऐसा होने से उसका डर कम हो चला है। मेडिकल पॉइंट के सॉफ्टवेयर से सूचना मिलते ही उसने वीडियोफोन पर रमन से संपर्क किया।
“कैसे हो?” माधुरी ने पूछा।
रमन ने मास्क मुंह पर लगाए लगाए ही अंगूठा उठाया।
“यह क्या यार, मास्क हटाकर जवाब दो।” माधुरी ने झिड़का।
रमन ने मास्क उतारा और कहा, “ठीक है। अब काफी आराम है।”
“मैं वहां आ जाऊं?”
“नहीं, कोई जरूरत नहीं। शाम तक तो मैं ही घर आ जाऊंगा।” रमन ने माधुरी को सांत्वना दी।
“हर बार ऐसा ही होता था। इसलिए इस बार भी ऐसा ही होगा।” रमन ने सोचा।
चिकित्सा कक्ष में एक पैथ-रोबो ने एक अत्यंत पतली सूई रमन की उगली में चुभोई जिससे रमन को कोई कष्ट नहीं हुआ। इस सुई में लगे सेंसरों ने रक्त का नमूना लिए बिना ही रमन के रक्त की कई जांचें कर लीं जिनके परिणाम उसने मेडिकल पॉइंट के चिकित्सकों, रमन की इंश्योरेंस कंपनी को भिज दिए और उन्हें रमन के ऑनलाइन रिकार्ड में भी अंकित कर दिया। वहीं लगी एक्स-रे मशीन ने उसके विभिन्न कोणों से उसके सीने के एक्स-रे लिए। ओपन माइक्रो एम.आर.आई. ने उसके फेफड़ों के चित्र खींचे और इन्हें मेडिकल पॉइंट के चिकित्सकों, रमन की इंश्योरेंस और उन्हें रमन के ऑनलाइन रिकार्ड को संप्रेषित कर दिया। जब तक रमन अपने चिकित्सक के पास पहुंचा वह रमन के बारे में बहुत कुछ जान चुका था और उसकी मेडीकल रिपोर्ट देख चुका था।
कुछ ही घंटों में रमन की हालत सामान्य हो गई। इस समय वह चिकित्सक के कक्ष में उसके सामने वाली कुर्सी पर बैठा था। उसके सामने एक कंप्यूटर स्क्रीन पर रमन की अब की जांचों की रिपोर्ट, इंश्योरेंस के लिंक से प्राप्त अब तक रमन की सारी चिकित्सकीय समस्याओं और उपचारों के रिकार्ड खुले हुए थे जिन्हें चिकित्सक बड़ी तन्मयता से देख रहा था। रमन उत्सुकता से चिकित्सक के बोलने की प्रतीक्षा कर रहा था। चिकित्सा रिकॉर्ड की फाइल बंद रखकर चिकित्सक रमन से मुख़ातिब हुआ।
“आपके एक्स-रे में मुझे कुछ परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं।” चिकित्सक ने रमन के एक्स-रे को कंप्यूटर में दिखा कर उस ओर देखते हुए कहा।
“कैसे परिवर्तन?” रमन के माथे पर चिंता की लकीरें उभरीं।
“आपके फेफड़ों में ‘फाइब्रस टिश्यू’ डिवेलप (विकसित) हो रहा है, यहां।” उसने सामने दिखते एक्स-रे में कुछ स्थानों पर कर्सर घुमा कर बताने की कोशिश की।
“उससे क्या होगा? मतलब मैं इसका क्या अर्थ लगाऊँ?”
“बार-बार और जल्दी-जल्दी ऑक्सीजन की अधिक मात्रा लेने से आपके फेफड़ों के ऊतकों (टिश्यू) में स्थाई नुकसान होने लगा है।”
“बार-बार और जल्दी-जल्दी क्या?” रमन को डर लगने लगा था।
“अब तक ऑक्सीजन पर आपकी निर्भरता ‘मानसिक’ है।”
“इसका क्या मतलब हुआ?”
“इसका अर्थ यह है कि आपको लगता है कि सांस लेने में मुझे परेशानी होने लगी है। मैं ऑक्सीजन ले लूं तो मुझे आराम मिल जाएगा। ऐसा सोचकर आप ऑक्सीजन पार्लर चले जाते हैं या ऑक्सीजन लेना शुरू कर देते हैं। पर ऐसे में आपके रक्त में ऑक्सीजन की इतनी कमी नहीं होती है कि कुछ समय आपको ऑक्सीजन न मिले तो आपके शरीर के किसी अंग को कोई नुकसान हो जाएगा। इसे ऑक्सीजन की ‘मानसिक निर्भरता’ (साइकोलॉजिकल डिपेंडेंस) या ‘ऑक्सीजन एडिक्शन’ कहते हैं।”
“हां, कभी-कभी तो मैं अपना मूड फ्रेश करने के लिए या थकान दूर करने के लिए भी ऑक्सीजन-पार्लर जाकर ऑक्सीजन के एक-दो शॉट ले लेता हूं।”
“आप ही नहीं, बहुत से लोग ऐसे कर रहे हैं। पर ऐसा नहीं करना चाहिए। ऑक्सीजन प्राणवायु है पर यह औषधि ही है, कोई टॉनिक नहीं है। इसलिए इसे औषधि की तरह ही प्रयोग किया जाना चाहिए, टॉनिक की तरह नहीं; जैसे कि आजकल आम आदमी कर रहा है। अगर ऑक्सीजन की कमी से थोड़ी-बहुत परेशानी हो रही हो तो उसे सहन करना चाहिए। जब बहुत जरूरत हो तभी ऑक्सीजन का प्रयोग करना चाहिए। वरना ज्यादा ऑक्सीजन से फेफड़ों के ऊतकों को स्थायी नुकसान होने लगता है। फिर ऐसे व्यक्ति का ऑक्सीजन के बिना काम नहीं चलता है उसे बीच-बीच में जल्दी-जल्दी ऑक्सीजन लेनी ही पड़ती है। नहीं तो उसके शरीर के महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचने का डर रहता है। इस स्थिति को ऑक्सीजन की शारीरिक निर्भरता (फिजिकल डिपेंडेंस) कहते हैं। ऐसे लोगों में फिर धीरे-धीरे ऑक्सीजन पर निर्भरता बढ़ती जाती है। वह जितनी ज्यादा ऑक्सीजन लेते हैं उनके फेफड़ों में उतना ही नुकसान बढ़ता जाता है। इस नुकसान से ऑक्सीजन की आवश्यकता और बढ़ती जाती है। फिर यह कभी न खत्म होने वाला चक्र चल पड़ता है जो ऐसे व्यक्ति की समय से पहले मृत्यु पर ही समाप्त होता है।”
“तो क्या मेरे फेफड़ों में भी यह चक्र चल पड़ा है? क्या मेरी भी समय से पहले मृत्यु........?” रमन के स्वर में कंपन था।
“अरे नहीं आपके फेफड़ों में ऐसे नुकसान के प्रारंभिक लक्षण दिखने लगे हैं। मतलब अब आपको सावधान रहना होगा। ऑक्सीजन तभी लें जब उसके बिना काम न चले। ऑक्सीजन को टॉनिक की तरह कदापि प्रयोग न करें।” चिकित्सक ने सांत्वना दी।
रमन की धड़कन काबू में आई। उसने पूछा, “मुझे अस्पताल में कब तक रहना पड़ेगा?”
“शाम तक आप वापस घर जा सकते हैं। दरअसल आपको ऐसा कुछ हुआ नहीं है। यह आपका ऑक्सीजन एडिक्शन है जिसकी वजह से आपको परेशानी महसूस हो रही थी। वैसे अभी तो आप ऑक्सीजन निर्भरता की मानसिक निर्भरता की श्रेणी में ही आते हैं।”
“थैंक्यू डॉक्टर, मैं सचमुच बहुत डर गया था।” रमन ने सामान्य होते हुए कहा।
“नहीं, आपको अब डरना भी चाहिए क्योंकि अगर अभी भी आप ऑक्सीजन को टॉनिक की तरह प्रयोग करते रहे तो शीघ्र ही आप ऑक्सीजन की शारीरिक निर्भरता (फिजिकल डिपेंडेंस) की श्रेणी में आ जाएंगे। तब आप न चाहें तो भी आपको सामान्य रहने के लिए बार-बार ऑक्सीजन लेनी पड़ेगी। बार-बार ऑक्सीजन लेने और उससे फेफड़ों में होने वाले नुकसान का चक्र चल पड़ेगा।”
ओह माई गॉड, अब मुझे क्या करना चाहिए?”
“आप ऑक्सीजन तभी लें जब बहुत जरूरी हो। यह नहीं कि जरा सी परेशानी हुई और आप ऑक्सीजन लेने चल दिए।”
कक्ष के दरवाजे से एक रोबोट ने प्रवेश किया। उसके हाथ में एक छोटी सी पेनड्राइव थी। चिकित्सक ने पेनड्राइव लेकर रमन सौंपी, “आपकी डिस्चार्ज समरी (अस्पताल से छुट्टी होने के समय मिलने वाला प्रपत्र), यह हमने आपके ऑनलाइन मेडिकल रिकॉर्ड में भी ऐड कर दी है और आपकी इंश्योरेंस कंपनी को भी बिल के साथ भेज दी है।”
“तो, तो मैं अब घर जा सकता हूं?”
“बिल्कुल।”
“मुझे रिव्यू के लिए कब आना होगा?”
“यह आपकी डिस्चार्ज समरी में लिखा है। वैसे आपको खुद नहीं आना है।”
“तो?”
“आपकी इंश्योरेंस कंपनी ने जो पैथ-रोबो आपको दिया है उसे एक सप्ताह बाद हमारी वेबसाइट से कनेक्ट करिए। हम उसे निर्देश दे देंगे। वह आपके रक्त का सैंपल लेकर हमारे द्वारा बताई गई जांच कर उन्हें इंश्योरेंस कंपनी को भेजने के साथ-साथ हमारी साइट पर भी अपलोड कर देगा। हम वे जांचें देखकर आपको निर्देश भेज देंगे कि आगे आपको क्या-क्या करना है।? क्या नहीं करना है? कौन सी दवाई लेनी है? बस आप उस दिन अपना इनबॉक्स खोलकर मैसेज देख लीजिएगा।”
“थैंक यू, डॉक्टर,” रमन ने कहा और पेनड्राइव लेकर बाहर आ गया।
उसे घर पहुंचाने के लिए मेडिकल पॉइंट का ‘टैक्सीकॉप्टर’ बाहर प्रतीक्षा में था। पहले तो उसने सोचा कि वह टैक्सीकॉप्टर से न जाकर अपनी ड्राइवरलेस इलेक्ट्रिक कार में ही घर जाए पर इस पीक टाइम पर ट्रैफिक का ध्यान आते ही उसने अपना इरादा बदल दिया। उसने अपनी कार में अपने घर के गैराज की लोकेशन फीड की और कार से बाहर आकर दरवाजा बंद कर दिया। खाली कार अपने गंतव्य की ओर चल दी। टैक्सीकॉप्टर की ओर बढ़ते हुए रमन सोच रहा था कि वह माधुरी को सूचना दे दे कि वह वापस लौट रहा है। कार के घर पहुंचने पर वह कार को गेराज में बंद कर दे।
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