मंगलवार, 10 जून 2014

हिंदी विज्ञान कथा : ऐतिहासिक परिदृश्य भाग-1



डॉ. अरविन्द दुबे
हिंदी विज्ञान कथा के उद्भट इतिहासकार श्री शुकदेव प्रसाद व अन्य कई विद्वानों के अनुसार हिंदी विज्ञान कथा का इतिहास सन् 1884 से 1888 के मध्य व्यास यंत्रालय भागलपुर,मध्य प्रदेश से प्रकाशित पत्रिका 'पीयूष प्रवाहमें धारावाहिक रुप से प्रकाशित लम्बी विज्ञान रचना 'आश्चर्य वृत्तांत से प्रारंभ होता है (1)(18)(19)। अध्ययन की सुविधा हेतु हम हिंदी विज्ञान कथा को मुख्यत: तीन खण्डों में बांट सकते है।
 आदि विज्ञान कथा (प्रोटो साइंस फिक्शन)   
विज्ञान कथा के एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित होने से पूर्व लिखी गईं विज्ञान कथाओं को 'आदि विज्ञान कथाओंकी श्रेणी में रखा जाता है। हमारी पौराणिक व धार्मिक पुस्तकों में बहुत सारे ऐसे वृत्तांत मिल जाते हैं जिनमें विज्ञान कथाओं के तत्व मिलते हैं। कुछ हिन्दी विज्ञान कथा मर्मज्ञ इन विवरणों की वैज्ञानिकता को तो स्वीकार करते हैं पर उनके अनुसार ये विज्ञान कथा के मानदण्डों पर खरी नहीं उतरतीं हैं। इसके विपरीत कुछ विज्ञान कथा विशेषज्ञ इन्हें विज्ञान कथा के रूप में सर्वथा अस्वीकार करते हैं क्योंकि इनमें उन्हें कहीं विज्ञान या वैज्ञानिक तत्व दृष्टिगोचर नहीं होतेभविष्य दर्शन के कोई तत्व नहीं मिलते।

उपलब्ध जानकारियों के हिसाब से देश-काल के साथ-साथ वैज्ञानिक परिभाषाएं और वैज्ञानिक मान्यताएं बदलतीं रहतीं हैं। विज्ञान तो हर क्षण विकसित होने वाला क्षेत्र है। इन पौराणिक कथाओं के लिखे जाने के समय विज्ञान अपनी अविकसित मान्यताओं के साथ अति प्रारंभिक अवस्था में ही रहा होगा। तब न अणु का ज्ञान था न आणविक ऊर्जा कान राकेट थे न स्पेस शटल। यह मानना तर्कसंगत नहीं हैं कि वैदिक युग में विज्ञान चरमोत्कर्ष  पर था और आज उसका ह्रास हो गया है। वैज्ञानिक मान्यताओं की उस भ्रूणावस्था में जब इस तरह के दृष्टांतों में किसी असंभव कार्य की कल्पना करते समय उस काल के लेखकों के पास ऐसे कार्यों को संपन्न कराने के लिये दो प्रकार के ऊर्जा विकल्प ही होते होंगेएक तो शारीरिक बल की अतिरंजना (जिसका कि उस समय के लेखकों ने भरपूर उपयोग किया हैजैसे कि भीम में साठ हजार हाथियों का बल था या मरते घटोत्कच्छ का शरीर इतना बड़ा हो गया था कि गिरते समय सेना का एक बड़ा हिस्सा उसके शरीर के नीचे दब कर नष्ट हो गया।) पर इस प्रकार की सोच की भी एक सीमा थी। अपनी सोच को और विस्तार देने के लिये उनके पास जो दूसरा ऊर्जा विकल्प था वह था मानसिक ऊर्जा का प्रयोग जिसका उपयोग करके वे किसी भी असंभव कार्य की कल्पना कर सकते थे। इन दृष्टांतों में उपयोग किये गये मंत्र शक्तिवरदान व श्राप की शक्तिजिनसे उन्होंने अपनी कथाओं में असंभव कार्यों की कल्पना कीवे सब इसी मानसिक शक्ति के अवतार ही तो हैं। तब इसमें अवैज्ञानिक क्या हैकहने का इस तात्पर्य यह है कि इन तथाकथित अवैज्ञानिक या 'पृच्छन्न विज्ञान कथानकोंका यदि सावधानी से  सूक्ष्मांवेण किया जाये तो ये भी विज्ञान कथाएं ही साबित होतीं हैं।

प्रख्यात लेखक विज्ञान कथा सम्पादक जार्ज मन अपने 'मैमोथ इनसाइक्लोपीडिया ऑफ साइंस फिक्शनके पहले ही वाक्य में स्वीकार करते हैं कि विज्ञान कथाएं तो प्रगैतिहासिक काल से ही अस्तित्व में हैं।(2) प्रख्यात विज्ञान कथा लेखक ओम प्रकाश शर्मा ने पौराणिक दृष्टांतों में विज्ञान के तत्व ढूढ़ने के प्रयास किये हैं (1) पर इसके बाद के विज्ञान कथा लेखकों ने इन आख्यानों को कभी
गंभीरता से नहीं लिया। समकालीन वरिष्ठ विज्ञान कथा लेखक डा. राजीव रंजन उपाध्याय ने अपनी नवीनतम पुस्तक 'वैज्ञानिक पुरा कथाएं' (2009) (3) में इस दिशा में एक गंभीर प्रयास किया है। अपनी इस पुस्तक में उन्होने पौराणिक कथाओं में वर्णित वैज्ञानिक तथ्यों की समकालीन वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर विद्वता पूर्ण विवेचना की है। पुस्तक के हर वाक्य में इस वेदज्ञाता  ब्राह्मण का दशकों में अर्जित वैदिक अध्यवसाय और अद्भुत तार्किक शक्ति साफ दिखाई देती है। वस्तुत: राजीव रंजन उपाध्याय की पुस्तक 'पुरा वैज्ञानिक कथाएंहिन्दी प्रोटो साइंस फिक्शन पर एक अति महत्वपूर्ण दस्तावेज है जो पौराणिक कथाओं के बारे में न केवल विज्ञान कथा लेखकों की दृष्टि को नए आयाम देता है वरन आने वाले समय में यह विज्ञान कथा लेखकों को इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता रहेगा।
आज जब हम उस समय के (जब ये विज्ञान कथाएं लिखीं गईं थीं) विज्ञान की परिसीमाओं की दुहाई
दे कर ठेठ अवैज्ञानिक और असंभाव्य 'फ़्रेंकस्टीन' (लेखिका-मेरी शैली-1818) (4) और 'मार्शियन क्रानिकल्सलेखक- रे ब्रेडबरी-1950) (5) जैसे कथानकों को सिर्फ विज्ञान कथा ही नहीं वरन विश्व की सर्वप्रथम विज्ञान कथा साहित्य और कालजयी विज्ञान कथा की श्रेणी में रख सकते हैं तो हमारी धर्मिक पुस्तकों में वर्णित  इन वृत्तांतों को क्यों नहींआज जब विज्ञान कथा विशेषज्ञअनुमानत: ईसा से भी 2000 वर्ष पूर्वप्राचीन ईराक में लिखित कविता 'गिल्गामेश एपिक' (6) में विज्ञान कथा के तत्व खोजने की बात कर रहे हैं तब हमें भी अपने इन वैज्ञानिक दृष्टांतों के प्रति अपने हठ्धर्मी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
'एपिक आफ गिल्गामेशमें वर्णित बाढ़ का दृश्य हमारे धार्मिक ग्रंथों में वर्णित महाप्रलय से एक दम मिलता है पर हम न जाने क्यों इन सब पर इस दृष्टिकोण से विचार करने को तैयार ही नहीं हैं?

छद्म विज्ञान कथाएं (स्यूडो साइंस फिक्शन)                                    
मैने एक विशेष प्रयोजन से विज्ञान कथा के इस वर्ग की कल्पना की है। मेरी जानकारी के अनुसार अब तक 'स्यूडो साइंस फिक्शनशब्द का प्रयोग कहीं नहीं किया गया है। जो शब्द प्रचलन में है वह है 'साइंस फिक्शन इन स्यूडो साइंसऔर ये दोनों शब्द समानार्थी नहीं हैं। मेरे अनुसार वह विज्ञान कथाएं जो देखने पर तो सामान्य विज्ञान कथाओं जैसी ही दिखाई देतीं हैं  पर गौर से देखने पर पता चलता है कि इनमें वर्णित तथ्य वैज्ञानिक तथ्यों की यत्र-तत्र अवहेलना ही करते हैं उन्हें ही 'स्यूडो साइंस फिक्शनके अंतर्गत रखा जा सकता है। एक विषम संयोग से देवकी नंदन 
खत्री रहस्य और रोमांच से भरे तिलिस्मी साहित्य लिखने में पृवत्त हुए और सन् 1918 में उनकी पहली पुस्तक 'चंद्रकांता' प्रकाशित हुई और इसके प्रकाशन के साथ ही उन्होंने प्रसिद्ध की सारी हदें पार कर लीं। वस्तुत: यह रहस्य रोमांच और चमत्कारों से भरा लेखन था जिसे एक शब्द 'तिलिस्ममें समायोजित किया जा सकता है। निश्चित रुप से ये विज्ञान कथाएं तो नहीं है पर इन्होने विज्ञान कथा लेखन हेतु वातावरण तैयार करने में काफी मदद की है। (1)

 पल्प साइंस  फिक्शन

हर काल में ऐसा साहित्य विज्ञान कथा की मुख्यधारा के समानांतर रहा है और कभी-कभी तो इसका पाठक वर्ग मुख्य विज्ञान कथाओं के मुकाबले काफी विशाल रहा है। "दिवाकर" के छद्म नाम से लिखने वाले एक लेखक (हो सकता है ये लेखकों का एक समूह रहा हो और ये छद्म नाम प्रकाशक का दिया हुआ हो) की कई पुस्तकें यथा सूरज की भेंटदिमागों का अपहरणलेडी रोबोशुक्र ग्रह पर धावानक्षत्रों का युद्धसमय के स्वामीकिरणों के चोर आदि काफी चर्चित रहीं हैं। इसके अतिरिक्त अंतरिक्ष का दानवहरे-प्रेतों का आक्रमणवृह्मांण पर हमला जैसी अनेकों पुस्तकें किशोर वय के पाठकों की पसंद रहीं हैं। इधर दृश्य-श्रव्य माध्यमों ने भी इस तरह की छद्म विज्ञान गल्पों को बहुत प्रश्रय दिया। शक्तिमानकेप्टन व्योम जैसे धरावाहिक इसके ज्वलंत उदाहरण हैं।(7)
(पल्प साइंस फिक्शन पर एक श्रंखला अमेरिकी वाईल्ड कैट बुक के प्रकाशकरान हैन्ना द्वारा कल्किआन अंग्रेजी (20)में प्रकाशित हुई है)।  

अगली पोस्ट में जारी-----

संदर्भ
1.शुकदेव प्रसाद (2007)-बीसवीं शती का विज्ञान विश्वकोश (भाग से 4), किताबघर प्रकाशननई दिल्ली।
2.जार्ज मन (2001)-मैमोथ इनसाइक्लोपीडिया ऑफ साइंस फिक्शनकांसटेबल पब्लिशर्सलंदन।
3.डा. राजीव रंजन उपाध्याय (2009)-वैज्ञानिक पुरा कथाएं, आर्य प्रकाशन मंडलनई दिल्ली।
4.मैरी शैली (1831)-फ्रेन्केनस्टीन ऑर दी मॉर्डन प्रोमेथियस http://www.gutenberg.org
5.रे ब्रेडवरी (1950 )- दी मार्शियन क्रॉनिकल्सडबल डे एन्ड कंपनी,न्यूयोर्क।
6.गिल्गामेश एपिक (अनुमानत: ईसा से 2000 वर्ष पूर्व) -- http://www.gutenberg.org
7.मनीश मोहन गोरे और अरविन्द मिश्र (2000)-विज्ञान कथा का सफरमंजुली प्रकाशन नई दिल्ली।
8.केशव प्रसाद सिंह (1900)- चन्द्रलोक की यात्राप्रति सन्दर्भ बीसवीं शती का विज्ञान विश्वकोश (भाग-1)
9.जूल्स वर्न (1863)-फाइव वीक्स इन ए बैलूनग्रेट वर्क्स ऑफ जूल्स वर्नब्लेक रोज पब्लिकेशंसदिल्ली
10.जूल्स वर्न (1865)-फ्राम दी अर्थ टूदी मूनhttp://www.gutenberg.org
11.अम्बिका दत्त व्यास (1884)- आश्चर्य वृत्तांतप्रति संदर्भ बीसवीं शती का विज्ञान विश्वकोश (भाग-1)
12.जूल्स वर्न (1864)- ए जर्नी टू दी सेन्टर ऑफ दी अर्थग्रेट वर्क्स ऑफ जूल्स वर्नब्लेक रोज पब्लिकेशंसदिल्ली।
13.मनोज पटैरियाअरविन्द मिश्र एवम राजीव रंजन उपाध्याय (2002)- प्रसारण माध्यमों के लिये विज्ञान गल्प (आकाशवाणीटेलीविजन)भारतीय विज्ञान कथा लेखक समितिफैजाबाद।
14.मनोज पटैरिया (2009)-विज्ञान कथाएंमन भाएंकल्किऑन हिन्दी- अगस्त 2009
15.राजीव रंजन उपाध्याय एवम् अरविन्द मिश्र (2000)-संचार माध्यमों के लिए विज्ञान कथाभारतीय विज्ञान कथा लेखक समितिफैजाबाद।
16.राजीव रंजन उपाध्याय (1989)- वैज्ञानिक लघुकथाएंप्रतिभा प्रतिष्ठानदरियागंजनई दिल्ली-2
17.राजीव रंजन उपाध्याय (2009)- प्रिया पकड़ी गईकल्किऑन हिन्दी।
18.श्रीनारायण चतुर्वेदी (1961)- सरस्वती हीरक जयन्ती अंक (1900-1959), इंडियन प्रेस (पब्लिकेशंस)प्राइवेट लिमिटेडइलाहाबाद।
19. शिवगोपाल मिश्र (मई 2000)- आश्चर्य-वृतांतले. अम्बिका दत्त व्यासअतीत के झरोखे सेविज्ञानविज्ञान परिषद्प्रयाग।
20. http://www.kalkion.com
21. देवकी नंदन खत्री en.wikipedia.org 22. चंद्रकांता संतति  en.wikipedia.org

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत बधाई। आपके ब्लॉग का लिंक मैंने अपने ब्लॉग हिंदी साइंस फिक्शन पर लगा दिया है.

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  2. वैज्ञानिक पूरा कथाये क्या नेट पर मिल जायेगी ?

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    1. नहीं वैज्ञानिक पुरा कथाये नेट पर उपलब्ध नहीं हैं इसके लिये आप इसके लेखक डा0 राजीव रंंजन उपाध्याय जी से rajeevranjan.fzd@gmail.com या vigyankatha_fzd@rediffmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं

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